मंगलवार, 27 मार्च 2018

इस हवा को क्या हुआ - रमेश गौतम

भाई रमेश गौतमजी ने अपने निवेदन में लिखा है ‘बचपन में अक्सर पिता की जन-संवेदना अवचेतन में कहीं संग्रहीत होती रहती थी जो बड़े होने पर निरंतर प्रबल होती गई।’ अपने परिवार की संस्कृति की धरोहर को सँजोना कोई आसान काम नहीं है। आजकल जो पुस्तकें निकल रही हैं, कहीं भी कोई पुस्तक अब ‘सरस्वती वन्दना’ से प्रारम्भ नहीं होती। यह एक पारिवारिक संस्कारों की ही देन है कि भाई गौतमजी ने ८० गीतो से समृद्ध अपनी पुस्तक का प्रारम्भिक गीत ही ‘अक्षरा वन्दना’ यानि कि ‘भाषा वन्दना’, कह सकते हैं कि ‘हिंदी वन्दना’ से की है, और लिखा है-
‘माँ अक्षरा अमृतमयी
हिंदी तुझे शत-शत नमन

स्वर और व्यंजन में निहित
तू ही प्रथम परिशोध है
तेरे बिना सम्भव कहाँ
अनुभूतियों पर शोध है
तो काल चिन्तन की कला
तू शब्द है, तू ही सृजन’
।।।।।।।
‘निर्गुण सगुण के रूप में
तू ने हरी मन की व्यथा
तू ने रचे साखी सबद
तू ने रची मानस-कथा
सत्संग से तू ही बनी
पद, सोरठा, दोहा, भजन’
कहा जा सकता है कि इस ‘अक्षरा वन्दना’ में रचनाकार ने हिंदी साहित्य के इतिहास, छंद निरूपण-व्यवस्था, रस-अलंकरण, रचना कर्म, संगीत का आरोह-अवरोह, बाँसुरी की तान आदि को एक बाँसुरीवादक की तरह ध्वनित करने का भरपूर प्रयास किया है। साखी, सबद, मानस-कथा, पद, सोरठा, दोहा, भजन और कामायनी के बिम्ब और प्रतीक का मानवीकरण हिंदी के इतिहास का विभाजन कालक्रम के आधार पर अपने गीत के ‘स्थायी’ और ‘अंतरों’ में रचनाकार ने कर दिया है। सुप्रसिद्ध भाषाविद डा। कमल सिंह ने अपने शोध से यह सिद्ध किया है कि ‘बाबा गोरखनाथ ही हिंदी के प्रथम कवि है’ और उन्होंने ही सर्व प्रथम ‘दोहा’ लिखा जिसे ‘सबदी’ का नाम दिया। रचनाकार ने बाबा गोरखनाथ, सूर, तुलसी, कबीर, विद्यापति, मीरा और जयशंकर प्रसाद के युग तक का सजीव दृश्य प्रस्तुत किया है। निर्गुण, सगुण का उल्लेख कर वेद-पुराण को भी एक जगह एकत्रित कर दिया है और यह उनकी अध्ययनशीलता का ही परिणाम है।
भाई गौतमजी ने पृथ्वी के प्राकृतिक आँचल को भी अपनी रचना का अंग बनाया है, जो उनके प्रकृति प्रेम को एक आकार देता है। जैसे कि ‘गुलमोहर के रंग वाले दिन’, ‘एक बादल’, ‘नदी की धार’, ‘शरद वधू’, ‘तीर्थयात्रा’, ‘आहटें’, ‘दो धूप के टुकड़े’, ‘कोहरे की मनमानी’, ‘नदी ठहरो’, ‘नदी अकेली रहती है’, ‘जानती है सच नदी भी’, ‘निर्वसन तरु’, ‘तन से नदी कामायनी’ आदि। प्रक्रति चित्रण तो ऐसा है कि लगता है कि रचनाकार प्रकृति की गोद में कहीं एकांत में बैठकर गीत को आकार दे रहा है-
‘बावली-सी खोजती-फिरतीं
दिशाएँ शाम को
लोग कितना भूल बैठे हैं
सुबह के नाम को
मन्दिरों के द्वार पर
ठिठकी खड़ी हैं अर्चनाएँ’
या
पुलों को बाँधने वालों
नदी की धार तो देखो
दिखाई अब नहीं देती
कहीं जलधार की कल-कल
बहुत रोई पटककर
पत्थरों पर सिर यहाँ हलचल
दिशा बदले बहावों पर
समय की मार तो देखो’
या
‘श्वेत शीतल छंद
लिखती हैं हवाएँ
गुनगुनाती ओस
भीगी प्रार्थनाएँ
गूँथ हरसिंगार वेणी में सुवर्णा
बँध गई सुप्रभात के आलिंगनों में’
भाई गौतमजी ने अपने गीतों में आजकल के पारिवारिक और सामाजिक संबंध के बीच की स्थिति को भी रचना का एक विषय बनाया है। समय के साथ भारतीय समाज भारतीय संस्कृति से बहुत दूर होता जा रहा है। भारतीय समाज, पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण आँख मूँदकर करने लगा है। विदेशी सभ्यता, भारतीय सभ्यता में ठीक उसी तरह घर बनाती जा रही है, जिस प्रकार हिंदी भाषा में अँगरेजी भाषा के शब्द। ‘बूढ़े माँ-बाप’, ‘मेरा भी है जन्म जरूरी’ आदि में यह प्रकरण देखा जा सकता है। माँ और बाप आजकल घर में एक बंधक के रूप में अकेलेपन के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं और बच्चे उनकी खोज-खबर भी नहीं लेते। नौकरीपेशा पर जाना और वरिष्ठ जनों का ध्यान न रखना की समस्या भयावह रूप में आजकल देखी जाने लगी है। बहु और बेटे ‘माँ-बाप’ को अपने सिर का एक बोझ समझने लगे हैं। पिता या माँ यदि सेवानिवृत्ति भत्ता पाने वाले हैं और दो या तीन बच्चे हैं तो सबकी दृष्टि उनके भत्ते पर होती है। माँ-बाप से पुत्रों का संबंध एक दुधारू गाय की तरह का रह गया है। देखा तो अब यह भी गया है कि मौत के बाद माँ-बाप को मुखाग्नि देने के लिए कोई उपलब्ध नहीं है, घर में दुर्गन्ध फैलने पर पड़ोसी पुलिस को सूचना देता है और वह उसे अपने विवेक से ठिकाने लगा देती है। रचनाकार ने आधुनिक संबंधों का एक मानवीय और हृदय को द्रवित करनेवाला चित्र प्रस्तुत किया है-
धनकुबेर पुत्रों का
धन्य है समाज

रोती देहरी
मिला कैसा अभिशाप
भेज दिए वृद्धाश्रम
बूढ़े माँ-बाप
काटकर जड़ें
नापे अपना कद आज
।।।।।
शिखरों को छूने में
भूले बुनियाद
संबंधों का करते
धन में अनुवाद
नयनों का नीर मरा
आती कब लाज
अभावों की जिन्दगी जीने वाले समाज के एक शब्द-चित्र का मानवीकरण देखने योग्य है, जिसका माध्यम एक वृक्ष है, कोई पौधा नहीं। वृक्ष भी नन्हा सा। नाटे कद का कोई व्यक्ति और अत्यंत धनहीन भी, जो फुटपाथ पर झोंपड़ी बनाकर रहने के लिए विवश है। उस नन्हें वृक्ष के पास ऊँचे महलों में रहनेवाले धनी लोगों की भीड़ है, जिन्हें बरगदों की भीड़ से चिन्हित किया गया है। कहा जा सकता है कि यह नन्हा वृक्ष गाँव से शहर पहुँचा हुआ कोई व्यक्ति है, जो अपनी रोजी-रोटी के लिए शहर के आकाश को ताक रहा है और महलों वाले लोग उसके अस्तित्व को उछाल रहे है और जो उसकी समस्या है उसे दूर करने की कोई नहीं सोचता। रचनाकार की पकड़ सामाजिकता पर कितनी मजबूत है ये पंक्तियाँ उसकी कहानी बताती हैं-
‘एक नन्हा वृक्ष हूँ
अपने समय की धूप में
झुलसा हुआ

भाल पर आकाश ने
उपहार में टाँगा मरुस्थल
दूर होता ही गया
प्यासे अधर से बूँद भर जल
रेत पर बोया गया स्वर
प्रार्थना का
बादलों ने कब छुआ’
गौतमजी ने राजनीति के राजनीतिकरण के खट्टे नीबूं को भी हथेलियों से दबाकर बहुत निचोड़ा है। राजनेता केवल अपने और अपने परिवार का हित सोचते हैं। समाजवाद या साम्यवाद एक नारा बनकर रह गया है और केवल वोट प्राप्त करने का एक साधन भर है। आम आदमी की बातकर, आम आदमी के सिर पर एक बोझ बन जाते हैं नेता। गरीबी मिटाने वाले अपनी गरीबी मिटाने में सफल हो जाते हैं किन्तु गरीबों की झोंपड़ी को एक टिन की चादर भी नहीं दिला पाते, आश्वासन के सिवा, छत की बात तो दूर की कौड़ी है। समाजवाद और साम्यवाद जो पूँजीवाद का विरोध करते हैं, पूँजी के महल में सो रहे हैं और दो जून की रोटी सड़क पर कल भी थी, आज भी है। आम आदमी की आवाज को जोर से उठाया है गीतकार ने अपने गीतों में। भाई गौतमजी कहते हैं-
‘छोड़-छाड़ रात को गई
चाँदनी पता नहीं कहाँ
बूँद-बूँद प्यास दिन जिया
बाँधकर हथेलियाँ यहाँ
फाइलों में खोदते कुआँ
देखते महोदय को हम’
या
‘आँधियाँ
सहता रहा दिन का किला
रात को हर बार
सिंहासन मिला
दें किसी सोनल किरण
को दोष क्या
जब अँधेरे ही चुने’
या
‘मर्म कहाँ छू पाते मन का
अंश किसी भाषण के
अब निष्कर्ष नहीं मिलते हैं
अनशन-आन्दोलन के
कागज की नावें तैराते
लहरों की हलचल में’
या ‘डालकर दो धूप के टुकड़े
हमारे द्वार पर
सूर्य तुम भी दूर हमसे हो गये’
किन्तु इतना होते हुए भी गीतकार का मन निराश नहीं है, वह जानता है ‘नर हो न निराश करो मन को’ और इन दुरभिसंधियों से दो-दो हाथ करने का निश्चय करता है और अपनी बात को ‘एक नन्हें दीप’ से कहलवाता है, इन छद्मनाम छद्मवेशी नेताओं को। जैसे कि-
‘चक्रवातों से लड़ेगा
फिर समर में
एक नन्हें दीप ने निश्चय किया’
या
‘मन में करो उजाला
खोलो रोशनदान निरीक्षक
भीतर की सँकरी गलियों में
तम है बहुत अभी तक
धूप पहनकर
नहीं निकलते
इन अँधियारों में क्यों’

भाई गौतमजी ने ‘मेरा भी जन्म जरूरी है’ के माध्यम से ‘भ्रूणहत्या’ की भी ‘पूछताछ’ और ‘जाँच पड़ताल’ अपने शब्दों में ठीक तरह से की है। यह कौन कराता है ‘भ्रूणहत्या’ माँ या पिता। मेरा क्या दोष है ? मेरा एक गीत है ‘भ्रूण कन्या’, ‘भ्रूण कन्या’ कहती है ‘कन्या होकर, हमने कोई पाप किया है / तुमने, उसने, सबने पश्चाताप किया है / पैदा होती तो पुरुष की आधी होती मैं / रानी लक्ष्मीबाई, इंदिरा गांधी होती मैं / होती राधा, हरती बाधा, आँधी होती मैं / खेल खेलकर, फिर कैसा प्रलाप किया है / कन्या होकर, हमने कोई पाप किया है।’ भाई गौतमजी भी कहते हैं-
‘माँ मैं भी दुनिया
देखूँगी
देना दो नयना
मेरा क्या है दोष
पक्ष माँ मेरा सुन लेती
जीवन देने से पहले
क्यों मृत्युदण्ड देती
मेरा भी है
जन्म जरूरी
माँ सबसे कहना’
चिंता है भाई गौतमजी को घर से विलुप्त होती गौरैयों की, कहते हैं विकास के नाम पर बढ़ते इस महानगर के विस्तार से –
‘गौरय्या भी एक घोंसला
रख ले
इतनी जगह छोड़ देना महानगर’

‘माँ’ केवल ‘माँ’ होती है। ’माँ’ को भी अपने शब्दों में स्मरण किया गया है भाई गौतमजी ने-
‘माँ तूने ही
पंख दिए हैं
तूने ही आकाश दिया है
बूँद-बूँद
तू रिक्त हुई माँ
मैंने सुख भरपूर जिया’

‘पिता’ और ‘माँ’ एक सिक्के के दो पहलू हैं, ‘पिता’ को स्थान न देना जीवन को अधूरा छोड़ने के समान था, यह कैसे सम्भव था। भाई रमेश गौतमजी ने ‘पिता’ को भी उचित स्थान दिया है अपने शब्दों में। कहते हैं-
‘आकाशकुसुम तोड़े
लहरों को बाँध लिया
अंतर में रहे हिमालय सा विश्वास पिता’
‘माँ’ और ‘पिता’ के लिए इतने भावुक और मार्मिक कहन के उपरान्त और कुछ अवशेष नहीं बचता है। समग्रत: कहा जा सकता है कि भाई गौतमजी नवगीत के माध्यम से समाज के हर विसंगति को लपेटे में ले रहे हैं और इनके नवगीत हिंदी की मुख्यधारा के गीत हैं जो हिंदी साहित्य की एक धरोहर हैं। ‘इस हवा को क्या हुआ’ के विषय में जनमानस की सोच ही पढ़कर बताएगी कि यह ‘हवा’ पाठक के मन को कितना स्पर्श करती है किन्तु यह कृति समीक्षकों को विवेचन-विश्लेषण के लिए उन्हें उकसाएगी अवश्य। भाई गौतमजी नवगीत के लिए जो कर रहे हैं और भविष्य में करेंगे, वह हिंदी साहित्य में समादृत होगा।
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गीत नवगीत संग्रह- इस हवा को क्या हुआ, रचनाकार- रमेश गौतम, प्रकाशक- अयन प्रकाशन, १/२०, महरौली, नई दिल्ली-११००३० , प्रथम संस्करण, मूल्य- रु. ४००, पृष्ठ- २०८, समीक्षा- शिवानंद सिंह सहयोगी, आइएसबीएन संख्या-९७८-८१-७४०८-९९०-८