गुरुवार, 9 मार्च 2017

उत्तरा फाल्गुनी - देवेन्द्र शर्मा इंद्र

देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' जी  का नाम नवगीत के उन पुरोधाओं में गिना जाता है जिन्होंने अपने पूर्ववर्ती, समकालीन और परवर्ती पीढ़ी के हर रचनाकार को किसी न किसी प्रकार अपने लेखन से आकृष्ट किया है। नवगीतकारों की एक पूरी परवर्ती पीढ़ी उनसे प्रेरणा ग्रहण कर रही है। उन्होंने अपने लेखन से न केवल प्रभावित किया है बल्कि यथासमय सबका मार्ग दर्शन भी किया है। 'इन्द्र' जी का रचना संसार इतना विपुल है कि उसमें से हर कोई अपनी रूचि के अनुसार रचनाओं का आस्वाद ले लेता है। निरंतर रचनाशील जीवन जीते हुए उन्होंने पंद्रह नवगीत संग्रह, चार दोहा संग्रह, छः ग़ज़ल संग्रह, 'कालजयी' नामक खंडकाव्य, छः समीक्षात्मक ग्रन्थ, मेघदूत का काव्यानुवाद, अनेक सहभागी लेखन और संपादित तथा सह-सम्पादित अनेक गीत /नवगीत / ग़ज़ल /दोहा संग्रह के प्रसंशित ग्रंथों के साथ-साथ कई पत्रिकाओं का सम्पादन किया है। प्रकाशित साहित्य के साथ ही उनके अप्रकाशित साहित्य का भी विपुल भण्डार है जिनमे छः पारम्परिक गीत संग्रह, ब्रज भाषा के तीन ग्रन्थ, नई कविता के दो संकलनों की सामग्री, सत्तरह हजार दोहों का भण्डार, 'मैं साक्षी हूँ' नाम से महाकाव्य, पाँच ग़ज़ल संग्रहों की सामग्री और लगभग दो हज़ार पृष्ठों की गद्य सामग्री है।

"उत्तरा फाल्गुनी", 'इन्द्र'जी का पंद्रहवाँ नवगीत संग्रह है। इस नव्यतम संग्रह में 'इन्द्र' जी ने अपने अक्टूबर २०१२ से जून २०१६ तक के ५२ नवगीतों को स्थान दिया है। संग्रह के प्रारम्भ में संक्षिप्त आत्म-निवेदन में 'इन्द्र' जी ने अपनी अस्वस्थता का उल्लेख करते हुए प्रख्यात नवगीतकार योगेन्द्र दत्त शर्मा द्वारा संग्रह पर लिखे विस्तृत आलेख को भूमिका के लिए ग्रहण करने के लिए रेखांकित किया है। फिर भी 'इन्द्र' जी ने वर्तमान रचनाशीलता और नवगीत की अंतर्वस्तु, भाषा तथा शिल्प पर अपने विचार प्रकट करते हुए समकालीन रचनाकारों की भीड़ के अधिकांश द्वारा वैचारिकी से अनजान होकर भी जैसे -तैसे लेखन को भी नवगीत का नाम दे देने की प्रवृत्ति पर पीड़ा व्यक्त की है। योगेन्द्र दत्त शर्मा जी ने 'नवगीत का सांस्कृतिक वैभव' शीर्षक के माध्यम से नवगीत की वैचारिकी के बिंदुओं का संक्षिप्त उल्लेख तो किया ही है साथ-ही-साथ प्रस्तुत संग्रह की विचार भूमि के सांस्कृतिक पक्ष का सटीक विवेचन भी किया है। योगेन्द्र जी अपने आलेख में इस पर विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं- 

"आज के अधिकांश रचनाकार नवगीत को यथार्थ का चित्रण भर मान बैठे हैं। सपाट भाषा में स्थूल यथार्थ का चित्रांकन करके ही वे अपनी रचनाशीलता की इतिश्री मान लेते हैं। सूक्ष्मता, सांकेतिकता, लाक्षणिकता, व्यंजकता, बहुस्तरीय अर्थ-छवियों जैसी बातें दुर्लभ होती जा रही हैं और सांस्कृतिक पक्ष तो जैसे कहीं खो गया है। संवेदना के नाम पर घरेलू स्थितियों का वर्णन या फिर हल्का-फुल्का प्रकृति चित्रण ही आज के नवगीत की सम्पदा बनकर रह गया है। मूल्यवत्ता और अर्थ-गौरव का क्षरण हो चुका है। नवगीत की विशेषताओं में ग्राम-बोध, नगरबोध, आधुनिकता, परंपरा, वैज्ञानिकता और युग-यथार्थ के अलावा एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण आसंग सांस्कृतिक चेतना भी है, जिसे पिछले कुछ वर्षों में भुला सा दिया गया है और जिसके बिना नवगीत संपन्न-समृद्ध होने से वंचित रह गया है।''  
 ‘इन्द्र’ जी के नवगीत संग्रह 'परस्मैपद'  के बारे में लिखते समय मैंने कहा था कि 'इन्द्र'  जी ने स्वयं जो भी बहुत कुछ लिखा है, वह अलग से विचारणीय है किन्तु इस कृति का मूल्यांकन करने के लिए भी 'इन्द्र' जी जैसे स्तर की मेधा, प्रज्ञा और प्रतिभा अपेक्षित है। मेरे जैसे व्यक्ति के लिए, जिसकी सम्पूर्ण आयु भी 'इन्द्र' जी के पूरे रचनाशील जीवन से कम है, उसके लिए विवेचन, समीक्षा, समालोचना या मूल्यांकन करने की कोशिश भी एक धृष्टता ही होगी। ‘इन्द्र’ जी के साहित्य को पढ़ते हुए मैंने स्वयं अनुभव किया है कि अभिव्यक्ति को आत्मसात करने के लिए पाठक को सागर जैसी गहराई तथा आकाश जैसी ऊँचाई तक देखने की सामर्थ्य होना आवश्यक है। फिर भी एक पाठकीय प्रतिक्रिया के रूप में जो मेरे  मष्तिस्क में जो उभरा उसे लिपिबद्ध करने का प्रयास किया है। 

यों तो गीत-नवगीत रचनाएँ स्वयं में स्वतन्त्र होती हैं किन्तु रचनाकार के मन्तव्य और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रभाव अवश्य प्रकट होता है। 'इन्द्र' जी के लेखन में भी पारिवारिक पृष्ठभूमि, परिवेश, अध्ययन, अनुभव और अभ्यास के प्रभाव परिलक्षित हैं। संस्कृत साहित्य के विद्वान्  'इन्द्र' जी ने नवगीतों में प्राचीन भारतीय वाङमय के अनेक पात्रों और सन्दर्भों को लाक्षणिक रूप में व्यक्त करते हुए समकालीन प्रासंगिकता से जोड़ा है जो उनके लेखन को ऊँचाइयों पर ले जाता है। प्राचीन वाङमय, इतिहास या मिथक के अनेक चरित्र जो अपनी प्रवृत्तियों के पर्याय बन गए हैं उन्हें अनेक गीतों में प्रसंगानुसार लाक्षणिक रूप में प्रयोग किया है। योगेन्द्र दत्त शर्मा जी ने अपनी भूमिका में सच ही कहा है-
''अतीत या परम्परा में झाँकना वर्तमान से पलायन नहीं है बल्कि परम्परा से शक्ति संचित करके  भविष्य की ओर प्रस्थान है।'' 
उसी अतीत और परम्परा से ऊर्जा ग्रहण करते हुए 'इन्द्र' जी ने वर्तमान को भी अपने प्रस्तुत संग्रह के गीतों में संगुम्फित किया है। आयु के इस पड़ाव पर पहुँच कर भी 'इन्द्र' जी अपने समय की घटनाओं और सूचनाओं से स्वयं को न केवल अद्यतन करते  हैं बल्कि अपने लेखन में भी उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। संग्रह के अनेक गीत समकालीनता के विश्लेषण और गहन विचार दृष्टि को लिए हुए हैं।

अस्सी पार की आयु के सजग मनुष्य की मनोदशा में निश्चित रूप से संसार से विदा होने की स्थिति के चित्र तथा अपने अतीत की स्मृतियाँ न चाहते हुए भी स्थान बना लेते हैं जो एक अपरिहार्य सत्य है। 'इन्द्र' जी के लेखन पर भी इस शाश्वत सत्य का प्रभाव आना स्वाभाविक है। अपने अनेक गीतों में इस अतीत और वर्तमान से जुड़े अनेक प्रसंग 'इन्द्र' जी ने भी अंकित किये हैं। संग्रह में इन मनस्थितियों के गीतों में, 'दीप की लौ हुई मद्धिम', 'ओ प्यासी धरती', 'विस्मृति के अतल गर्भ में', 'मैं अनस्तित्व में अस्ति का बोध', 'अक्षर को साधा है', 'उत्तरा फाल्गुनी', 'एक जन्म दो मुझको', 'धूप ढली आखरी पहर की', 'असाध्य साधना' , 'जाल समेटें' शीर्षक  के गीत प्रमुख हैं। इन रचनाओं में भी कोई दैन्य नहीं बल्कि एक सात्विक अहम् के दर्शन होते हैं तथा आने वाली पीढ़ी को अपनी संचित सर्जना को सौंपते हुए कहते हैं। 

''मैं विस्मृति के अतल गर्भ में 
उतर रहा हूँ सीढ़ी-सीढ़ी 
जाने अब आगंतुक पीढ़ी 
मैंने क्या कुछ नहीं किया है

हर उत्सव में, समारोह में 
पहुँचूँ अब कैसे संभव हो 
घर से बाहर गए बिना ही 
मैंने सब कुछ देख लिया है 

तुम्हें चाहिए छाँव घनेरी 
मीठे फल फूलों की ढेरी 
इसे नीर दो, इसे खाद दो 
पौधा मैंने रोप दिया है''
(मैं विस्मृति के अतल गर्भ में)

स्वयं को अनस्तित्व में अस्ति का बोध निरूपित करते हुए ‘इन्द्र’ जी कह रहे हैं-
''सिन्धु मंथन-जनित 
मैं न अमृत कलश 
उत्खनन में मिला 
भग्न मृद्भाण्ड हूँ 

जल प्रलय में उभरती 
नयी सृष्टि हूँ
मैं अनस्तित्व में 
अस्ति का बोध हूँ 
मंत्र हूँ, बीज हूँ 
अन्न हूँ, अग्नि हूँ
यज्ञ में नव सृजन का 
सतत शोध हूँ 

बँध सका मैं नहीं 
देश में काल में 
नापता मैं रहा 
कोटि ब्रह्माण्ड हूँ 
(मैं अनस्तित्व में 
अस्ति का बोध हूँ)

जीवन की समग्रता का उपलब्ध हर व्यक्ति का अलग होता है। 'इन्द्र' जी अपने जीवन संघर्ष को अपने गीत 'अक्षर को साधा है' में स्पष्ट करते हैं, कि..
''अक्षर को साधा है 
झेल कर क्षरण मैंने 
एक जन्म पाने को 
जिए सौ मरण मैंने 

शब्द अर्थ से व्याहत 
रचा व्याकरण मैंने 
भाषा को पहनाया 
नया आभरण मैंने 

बिना कवच, बिना व्यूह 
लड़े नित्य रण मैंने 
दिया हर व्यवस्था को 
शील आचरण मैंने''
(अक्षर को साधा है)

संग्रह का शीर्षक गीत 'उत्तरा फाल्गुनी' जीवन दर्शन के भोगे हुए यथार्थ को जन्म-मरण चक्र, पुनर्जन्म की भारतीय दार्शनिकता में 'आत्मनेपद' से 'परस्मैपद'  की अवधारणा को बड़ी सहज भाषा में उल्लेखित किये हुए है। 
'मखमली दूब पर माघ की 
धूप पसरी रही गुनगुनी 
याद की डोर से है बँधी 
साँझ वह उत्तरा फाल्गुनी 

जन्म हमने न कितने लिए 
यों ही मिलते-बिछुड़ते हुए 
आगे बढ़ते कि मुड़ते हुए 
डगमगाते कि उड़ते हुए 
ओढ़ कर भी जो मैली न की 
झीनी चादर न हमने बुनी'' 
(उत्तरा फाल्गुनी)

असाध्य को साधने का अपराध करने के अपने जीवन -वृत्त में आधी उम्र अवसादों की लंबी सूची बाँधते हुए बीत गई और बिना रँगे चीवर वाला सन्यास भोगते हुए तथाकथित दुनिया की व्यावहारिकता से दूर रहकर उसी निषिद्ध मार्ग पर निर्बाध रूप से चलते रहे। 
''हम असाध्य को साध रहे हैं 
करते यह अपराध रहे हैं 

आधी उम्र बाँधते बीती 
लंबी सूची अवसादों की 
आधी उम्र लादते बीती 
गठरी मिथ्या -परिवादों की 
सब के माथे तिलक रचा कर 
अपने माथ कलंक लगाया 
जिया सदा सन्यास भले ही 
चीवर हमने नहीं रँगाया
दुनियादारों ने समझाया 
उनकी कोई सीख न मानी 
जो निषिद्ध था उसी पंथ पर 
चलते हम निर्बाध रहे हैं''
(असाध्य साधना)

अपनी समसामयिकता से सदैव संपर्क बनाये हुए एक सजग रचनाकार समय और परिवेश का गहन विश्लेषण करता है। उसे ही अपनी प्रतिक्रया स्वरुप लेखन में व्यक्त करता है। 'इन्द्र' जी ने अपने परिवेश और समकालीनता पर जो प्रतिक्रया व्यक्त की है वह इनके अनेक गीतों में प्रकट हुई है। उनके गीत, 'रोशनी के फूल', 'अँधियारा दाय में मिला', 'अच्छे दिन', 'यातना शिविर', 'डूबे अतलान्तों में', आदि सामयिकता का सशक्त शब्दाङ्कन हैं। गीतों के पद्यांश पर दृष्टि डालिये...
 ''एक ज्वालामुखी पर्वत पर 
रह रहे हम 
लाख के घर में 
क्या पता कब 
पुण्य कोई खोट हो जाए 
एक चिंगारी
महा-विस्फोट हो जाए 
जागती हर ओर आशंका
सो नहीं पाते 
इसी डर में 

हर दिशा में रक्त-लोलुप 
झूमती लपटें 
सिंह झाड़ी से निकल कब 
मृगों पर झपटें 
जल रहीं हैं कमल पंखुड़ियाँ 
विष बुझे 
मानस सरोवर में'' 
(रोशनी के फूल)

इसी के साथ देखिये...

''अँधियारा दाय में मिला 
पिघली कब धुंध की शिला 
धूप के हुए न कभी 
छाँव के हुए 

सड़कों चौराहों पर हम 
चलते ढोकर अपनी लाश 
सर पर ताने छतरी-सा 
फटा हुआ तपता आकाश

यात्रा के आँकड़े हुए 
सरहद पर हैं खड़े हुए 
शहर के हुए न कभी 
गाँव के हुए 

कोयल को अब सुनता कौन 
पसरा है असगुनिया मौन 
मरघट में सिर्फ 
काँव-काँव के हुए''  
(अँधियारा दाय में मिला) 

एक अन्य गीत 'चन्दन-लता ने है डसा' में और स्पष्ट किया है-
'हिम ने हमें झुलसा दिया 
था कब जलाया आग ने 

कैसी चली फिर वो हवा 
जलने लगा सारा चमन
हर फूल बागी हो गया 
चुभने लगी हर पाँखुरी 
उगने लगी फिर बाँस-वन में
क्यों निरंतर लाठियाँ 
बोने लगी चिनगारियाँ  
सबसे मधुर हर बाँसुरी 
जीते विरोधों में रहे 
मारा हमें अनुराग ने 

चन्दन-लता ने है डसा 
हमको न काटा नाग ने '  
(चन्दन-लता ने है डसा)

अच्छे दिन का वायदा करने वालों के खोखलेपन पर अपनी भविष्य-दृष्टि से सत्तासीन होने के एक माह बाद ही 'इन्द्र' जी ने अपने गीत 'अच्छे दिन' में व्यक्त कर दिया था-
लोग कहा करते थे
'अच्छे दिन आएँगे'
अच्छे दिन
आने से पहले ही 
चले गये  

पर ऐसा कुछ न हुआ 
हम सबके सपने वे
चक्की के 
पाटों में दानों से 
दले गये  

हर चूल्हा सुलगेगा 
होगी छत हर सर पर 
नवयुग की 
आशा में युग-युग से 
छले गये
(अच्छे दिन)

तथाकथित बौद्धिकता के लिए विचित्र वेश और भंगिमा बनाकर प्रतिभा प्रदर्शन करने वालों पर प्रहारक व्यंजना अपने गीत 'आप क्यों उदास हो गए' में व्यक्त करते हुए कहा है-
''छोटी सी घटना से आप 
एक उपन्यास हो गए
आप क्यों उदास हो गए 

पाकर कुछ प्रातिभ उन्मेष 
धारण कर श्मश्रु जटिल वेष 
तमसा के तीर अन्ततः 
शोकः श्लोकत्वमागतः 
करुणा-विगलित होकर ही 
दस्युराज रत्नाकर भी 
शाश्वत इतिहास हो गए 
आप क्यों उदास हो गए 

ऋतुओं में ऋत रहा न रंच 
देखो अब मंच के प्रपंच 
अभिनेता हास हो गए 
आप क्यों उदास हो गए 
(आप क्यों उदास हो गए)

इसी के साथ  एक दूसरे गीत में-

'स्वार्थ-साधन अर्थ इनका 
धर्म से निरपेक्ष हैं ये
ये न उपमा, ये न रूपक 
सनातन उत्प्रेक्ष हैं ये'
(था हमें जिस बात का डर)

 'इन्द्र' जी नवगीत परम्परा के शिखर पुरुष हैं। उन्होंने गीत/नवगीत को परिभाषित करते हुए अपनी अनेक रचनाओं में सूत्र रूप में दिशा दी है। 'शब्द तो इकहरे हैं' गीत की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
‘शब्द तो इकहरे हैं 
पर इनमें अर्थ निहित 
व्यापक हैं, व्यंजक हैं 
गहरे हैं 
*
गीत नहीं बन पातीं 
मन की सब इच्छाएँ 
अधरों तक आँखों की 
अनथकी प्रतीक्षाएँ  
कितनी सीमाएँ हैं 
पहरे हैं 

निरपराध न्याय के 
कठहरे हैं'
(शब्द तो इकहरे हैं)

और फिर गीत-नवगीत पर होने वाले निरर्थक विमर्श पर कह रहे हैं-
"आइये मिलकर करें हम 
अब विरुद्धों का समंजन 
अर्थहीन विमर्श करते 
गीत क्या, नवगीत क्या है 
काल की चक्रिल धुरी पर 
ग्रीष्म क्या है शीत क्या है
हैं सदा ही एक दोनों 
लोक-मंगल, लोक-रंजन''
(विरुद्धों का समंजन) 

गीत की विधा को जन्मान्तर सहचारिणि मानने वाले 'इन्द्र' जी इसे पाकर स्वयं को धन्य हुआ मानते हैं। संग्रह के अंतिम गीत में स्वयं को व्यक्त करते हुए कह रहे हैं-
''जन्मान्तर सहचारिणि 
प्राण-सन्निधा 
तुमको पा धन्य हुआ 
गीत की विधा 

सर्जन के क्षण हैं 
मैं स्थितप्रज्ञ हूँ 
तुम सँग रचता 
अभिनव भाव यज्ञ हूँ 
तुम त्रिकाल संध्या हो 
मैं कृतज्ञ हूँ 

तुमको पाकर मन की 
मिटी हर द्विधा 
(गीत की विधा)

 'इन्द्र' जी अपने आत्माभिमान के साथ संग्रह के अनेक गीतों में उपस्थित हुए हैं। 
"मंच पर वक्तव्य हूँ 
एकांत में चुप हूँ 
सूर्यता का भाष्य हूँ मैं 
अँधेरा घुप हूँ 

कल जब न हूँगा 
तुम्हें तब याद आऊँगा 
मैं तुम्हारा कंठ 
लेकर गुनगुनाऊँगा 
स्वर्ग का मैं कल्पतरु हूँ 
भूमि का क्षुप हूँ"
(सूर्यता का भाष्य हूँ मैं)

तथा-

‘सूखे का देना मत ताना 
बादल अब हर दिन बरसेगा'
(हर दिन बरसेगा)

और फिर एक दूसरे गीत में-
  
''रीढ़ जब से झुकी मेरी 
और तन कर चल रहा हूँ 
एक वृद्ध जटायु-सा मैं 
युद्धरत हर पल रहा हूँ''
(और तन कर चल रहा हूँ)

और फिर-
  
‘ढली दुपहरी साँझ हुई अब 
हम भी अपना जाल समेटें 

जीवन और मरण का शाश्वत चक्र 
मगध में है ले आया 
वासवदत्ता का भ्रम है यह 
या पद्मा की स्वप्निल छाया 
यह वियोग है या कि मिलन है
कैसी हैं ये प्रणय-सहेटें 
(जाल समेटें)

एक दूसरे गीत में-
''दीप की लौ हुई मद्धिम
झुकी पलकें 
कोयलों की राख पर 
सोयी अँगीठी 

शैल-देही पड़ा है 
निष्प्राण कुंजर 
सूँड में जिसकी घुसी है 
एक चींटी 

कौन-सा, किसने 
नया अध्याय जोड़ा 
नयी कह-कह कर 
पुरानी लीक पीटी''
(दीप की लौ हुई मद्धिम)

'इन्द्र' जी के संग्रह पर समग्र रूप से पाठकीय प्रतिक्रिया देना सरल नहीं है। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी 'इन्द्र' जी के गीतों के कथ्य, शिल्प, भाषा और शब्द-युग्म अपने पात्र, परिस्थिति और सन्दर्भ के अनुसार हैं। काव्य-भाषा के बारे में  'इन्द्र' जी ने अपने आत्म निवेदन में स्वयं कहा है- 

''भाषा और साहित्य की शब्दावली से आप जितने सम्पन्न होंगे उतनी ही आपकी ज्ञानात्मक-संवेदना भी विकसित होगी। ... काव्य-भाषा सदैव विषयवस्तु के अनुसार बदलती रहती है। कहने का आशय यही है कि काव्य-भाषा की सम्प्रेषण-क्षमता को किसी एक ही साँचे में नहीं ढाला जा सकता।'' 

'इन्द्र' जी ने अपने इस वक्तव्य का अपने लेखन में पूरी तरह निर्वाह किया है। जहाँ कथ्य की ऊँचाइयाँ और गहराइयाँ हैं वहाँ भाषा भी उसी के अनुरूप है तथा जहाँ गीत-नवगीत के सूत्र रेखांकित किये हैं और समकालीनता को व्यक्त किया है वहाँ भाषा अपनी सम्प्रेषण क्षमता को बनाये हुए है। विषयवस्तु की विविधता के अनुसार उनके काव्य को समझने में यदि कोई स्वयं को अक्षम पाता है तो उसे अपने ज्ञानात्मक परास का विस्तार करना आवश्यक है। उसी प्रकार यदि समीक्षा के स्थापित प्रतिमान 'इन्द्र' जी के लेखन की विवेचना करने में अपर्याप्त रहते हैं तो समयानुसार उन प्रतिमानों की पुनर्व्याख्या, पुनर्विचार और संशोधन आवश्यक है। प्रस्तुत संग्रह अपने समय का उल्लेखनीय नवगीत ग्रन्थ है जो  'इन्द्र' जी के अनस्तित्व में अस्ति के बोध का प्रकटीकरण है। एक ऐसा समुच्चय है जो नवगीत लेखन से जुड़ी हर पीढ़ी को प्रेरणा देता रहेगा तथा जिसके माध्यम से 'इन्द्र' जी ने आगंतुक पीढ़ी को अपने जीवन की सर्जना का विवेचन करने, ग्रहण करने तथा खाद-पानी देकर सींचने की कामना व्यक्त की है। 'इन्द्र' जी अपने गीत 'मैं फिर उगूँगा' में विदा लेते हुए साँझ के आकाश में फिर उगने की आश्वस्ति देकर कह रहे हैं- 

'मैं फिर उगूँगा साँझ के आकाश में 
मुझको विदा दो, भोर का नक्षत्र हूँ'

'उत्तरा फाल्गुनी' नवगीत संग्रह काव्य के गंभीर पाठकों, अध्येताओं, एवं साहित्यिक विमर्शकारों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने वाला पठनीय, उल्लेखनीय, उद्धरणीय तथा संग्रहणीय दस्तावेज है। हमारी कामना है 'इन्द्र' जी स्वस्थ रहते हुए दीर्घजीवी हों तथा अपने आशीर्वाद से समकालीनों, परवर्तियों और आगंतुक नवांकुरों को अनुग्रहीत करते हुए अपने विपुल ज्ञानकोष से और भी सर्जना के पुष्प देकर लाभान्वित करते रहेंगे।
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गीत- नवगीत संग्रह - उत्तरा फाल्गुनी, रचनाकार- देवेन्द्र शर्मा इंद्र, प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद । प्रथम संस्करण- २०१६, मूल्य-१६०   रुपये, पृष्ठ-१२०, समीक्षा- जगदीश पंकज।

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