मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

अक्षर अक्षर फूल बने जब -रणजीत पटेल

कविता की कोई सुनिश्चित परिभाषा अब तक नहीं बनी फिर भी इतना तय है कि ज़िन्दगी के सुख दुःख से निकलकर अनुभूतियाँ जब अपनी लयात्मक छवि प्रस्तुत करती हैं तब उसे हम गीत या कविता ही कहते हैं। कवि शब्दों के अंतर्मन में प्रवेश करता है फिर उन शब्दों को अपनी भावना से जोड़कर जागतिक प्रपंचों से निकलने का सर्वजन हिताय- सर्वजन सुखाय पंथ तलाशता है। गीत हमारी राग दीप्त अनुभूतियों का आत्मिक स्वर है तो सामाजिक चेतना की तरल अभिव्यक्ति भी। यह रागधर्मी होकर मूलतः जीवनधर्मी है। 

'अक्षर- अक्षर फूल बने जब' डॉ रणजीत पटेल का पहला संग्रह है। यद्यपि इसके पहले 'गीत विहंग विहार' शीर्षक से बिहार के गीतकारों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ का संचयन व संपादन कर चुके हैं। रणजीत पटेल का प्रस्तुत नवगीत संग्रह पढ़ने पर ऐसा लगता है कि इनके भीतर का रचनाकार कुछ होना चाहता है, कुछ नया करना चाहता है ऐसे में इनकी कृति मूल्यवान हो जाती है --

 'घर अपना है कोई पराया नहीं
स्वप्न अपना किसी का चुराया नहीं'

'अक्षर अक्षर फूल बने जब' में कवि के सहज काव्यमय उच्छवास के दर्शन होते हैं। कविता के विविध विधागत रूप हैं और उन रूपों में कविता के अनेक रंगों को देखा जा सकता है। महर्षि वाल्मीकि से लेकर आज के कवि तक के रचनाकर्म में मनुष्य के मनोगत भावों को न जाने कितने- कितने रंग रूपों में कविता वहन करती आई है। जीवन- जगत के प्रति लौकिक अलौकिक समस्त प्रकार की संवेदनाओं को स्वर देती आयी है। कविता के जितने भी स्वर हैं उनमें एक आदिम स्वर है रागात्मकता का। यह रागात्मकता प्रकृति पुरुष शक्ति या किसी और के प्रति भी हो सकती है। डॉ पटेल की कविताएँ  ही इस रागात्मकता से सराबोर लगती हैं। उनकी रागात्मकता जहाँ  प्रकृति के विविध रूपों से एकाकार होती है वहीँ समाज परिवार की विविध स्थितियों से संपृक्त होती है। डॉ पटेल हार नहीं मानते हैं --

 "तुम पलाश हो, होगे सुन्दर
किन्तु झाड़ कह मुझे न हँसना
व्यर्थ नहीं यह जीवन मेरा
तुम नागों सा मुझे न डसना"

रचनाकर्म में गीतकार किसी को छोटा बड़ा नहीं मानता है --

"कोई छोटा बड़ा न जग में
सबकी अपनी अपनी सत्ता
वृक्ष बड़ा हो पर क्या छोटा
कहलायेगा उसका पत्ता"

कोई रचनाकार जब समग्रता में जीवन को देखता है तब रचे गए गीत की महत्ता और उपयोगिता सार्वजनिक बन जाती है। डॉ पटेल का गीतकार अपने समाज और समय का यथार्थ करीब से देखता है फिर अपने गीत में उसे पिरोता है। इस स्थिति में गीत की शाश्वतता बढ़ जाती है और यह भ्रम टूट जाता है कि आज के समय में गीत का
क्षरण हो रहा है। हवाबाजी से गीतकार घबराता नहीं है --

"रहा नहीं विश्वास अब 
हवा की तेज़ रफ़्तार में 
लपट उठ जाती है रोज़ रोज़
भीड़ भरे बाजार में"

डॉ रणजीत पटेल  वर्षा, शीत, पतझड़, वसंत, ग्रीष्म आदि प्रकृति जन्य ऋतुओं के जितने भी प्रकार हैं उन सब क्षणों  को अपने गीतों में साकार करते हैं। प्रकृति के विविधवर्णी बिम्बों की सर्जना करते हैं। पारिवारिक -सामाजिक सम्बन्धों में बढ़ती दूरियों के साथ पर्यायवरण में व्याप्त और निरंतर सघन होते प्रदूषण के प्रति भी गीतकार की चिंता संग्रह में शिद्दत से दिखाई पड़ती है। इतना ही नहीं समाज में बढ़ती संवेदनहीनता, आपसी दूरियाँ और उनके साथ प्रकृति, पर्यायवरण, गरीबी- अमीरी, शोषण, अनाचार, मँहगाई, बाजारवाद, उपभोगी प्रवृत्ति का ऐसा वृतांत अपने गीतों में बुनते हैं कि गीत अगीत का अंतर बेमानी हो जाता है और रचना पूरी संवेदना के साथ मन में उतरती चली जाती है।

डॉ. रणजीत पटेल रचना में गति- प्रवाह और गीतात्मकता निर्वहन के प्रति सजग तो हैं, किन्तु कथ्य के साथ समझौता उन्हें स्वीकार नहीं। एक ईमानदार रचनाकार की यही पहचान है। मुझे उम्मीद है कि समाज के सुधी पाठकों और साहित्यकारों के बीच इस नवगीत संग्रह का स्वागत और समादर होगा। 
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गीत- नवगीत संग्रह - अक्षर अक्षर फूल बने जब, रचनाकार-  रणजीत पटेल, प्रकाशक- अभिधा प्रकाशन, रामदयालु नगर, मुजफ्फरपुर-८४२००२ । प्रथम संस्करण- २०१५, मूल्य-१००   रुपये, पृष्ठ-७९, समीक्षा- राजा अवस्थी।