सोमवार, 26 सितंबर 2016

ठहरा हुआ समय - मयंक श्रीवास्तव

'ठहरा हुआ समय' ,प्रख्यात गीतकवि मयंक श्रीवास्तव का पाँचवाँ गीत ग्रह है जिसमें बावन गीतों को स्थान दिया गया है। शीर्षक के अनुरूप ही मयंक जी ने अपनी समकालीनता पर गीतों द्वारा व्यंजनापूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त की है। आरम्भ से लेकर अंत तक कसे हुए शिल्प और प्रभावपूर्ण भाषा के माध्यम से मयंक जी ने युगीन सत्य को उकेरा है तथा सम्प्रेषणीयता का निरंतर निर्वाह करते हुए सफल गीतात्मकता को बनाये रखा है। 

कवि मयंक श्रीवास्तव के गीतों में समाज है -अपने विभिन्न रूपों में। उसकी विद्रूपताएँ हैं, विसंगतियाँ हैं, विखंडन है।  इसके साथ साथ वह अपने परिवेश पर दृष्टि लगाये रहता है।  इन गीतों में नगर हैं, गाँव हैं - उनकी छवियाँ हैं। कवि मयंक इन गीतों में एक चिंतक के रूप में भी हमारे सामने आता है यहाँ उसके नेत्र के केन्द्र में व्यक्ति होता है। नि:संदेह यह व्यक्ति प्रत्यक्ष, परोक्ष अपने इर्द गिर्द से जुड़ा हुआ है, या यों कहिये कि इस इर्द गिर्द ने इस व्यक्ति को जो दिया है उसकी परिणति, परिणाम को कवि उकेरता है।

प्रस्तुत संग्रह के गीतों में उनकी मानवतावाद, मूल्यनिष्ठा, करुणा, नैतिकता और लोकमंगलोन्मुखी वैचारिकी का निरूपण है और मयंक श्रीवास्तव अपनी प्रतिबद्धता से कभी विचलित नहीं हुए हैं। संग्रह के प्रथम गीत की पहली पंक्तियाँ ही उनके आम जन से जुड़े होने और पक्षधरता को प्रदर्शित कर रही हैं-
'अभी अभी  तो मुझे
मिली थी बस्ती प्यासों की
बता रही थी पीर
मुझे जख्मी अहसासों की। 
इतनी दागी गई
समय की गर्म सलाखों से 
सूखा हुआ समन्दर 
झाँक रहा था आँखों से 
नहीं ख़ास बनकर रह पाई
अपने खासों से '. 

अपने सामाजिक यथार्थ से टकराते हुए कवि सामयिक व्यवस्था पर दृष्टिपात करता है। उसके स्वर में तंज है, व्यवस्था के प्रति आक्रोश है, व्यवस्था से पीड़ित लाचारी की व्यथा कथा है।  कवि के समय का यह यथार्थ सामाजिक शासनिक, प्रशासनिक नियंत्रण के स्खलन का भोक्ता है, और यह स्थिति इतनी भयावह है कि कवि को समय भी 'ठहरा हुआ लगता है' - न पीछे ही लौटने के आसार हैं (यद्यपि ऐसा नहीं होता) और इस वस्तुस्थिति से निजात भी संभव नहीं दिख रही।  कवि कराह उठता है अपने इन शब्दों के साथ- "हर आने वाले मौसम का सूखा हुआ हृदय लगता है'।

शहरी जीवन के बदलते मनोविज्ञान का वर्णन 'विवादों का शहर' गीत में करते हुए कवि ने कहा है-
'प्रश्न हल करता नहीं है 
यह विवादों का शहर. ' 

मयंक श्रीवास्तव सदैव की भांति अपने गाँव को नहीं भूलते। जब उन्हें "हवा पहले जैसी नहीं लगती" और शहर से लौटा बेटा 'बिरयानी' और 'ड्रग' की पुड़िया लाता है तो गाँव के अधकचरेपन के साथ नगर के अपना लेने की प्रक्रिया को ही बड़े प्रभालशाली ढंग से प्रस्तुत कर रहे होते हैं।
' आकर गाँव शहर का लड़का 
फिर भोपाल गया 
मेरे लड़के के 
जीवन में 
आ भूचाल गया .'

उपरोक्त विद्रूपताओं, विसंगतियों , छल छद्मों के चलते सबसे अधिक उद्वेलित कोई चिंतनधर्मा व्यक्ति ही हो सकता है।  मयंक श्रीवास्तव का रचनाकार यहाँ विभिन्न कोणों से ऐसे ही व्यक्ति के साथ खड़ा है, बतियाता है, मुखर होता है यह व्यक्ति जैसे नीति बद्ध नीति निबद्ध जीवन जीने को अभिशप्त है। उसकी पीड़ा काल कोठरी नें बंद किसी व्यक्ति से कम नहीं है। तभी कवि के समय की हवा इसके साथ केवल ठिठोली ही कर सकती है। ऐसे माहौल में कवि जब कहता है कि, "पतझड़ द्वार से जाने न दो" तो जैसे गालिब के दर्द का दवा हो जाने की ही बात कर रहा हो।  कवि मयंक का यह चिंतन डूबा हुआ व्यक्ति अपनी लाचारियों पर केवल बड़बड़ाता ही नहीं, उनके सम्मुख तनकर खड़ा भी होता है और अपनी आनेवाली पीढी को कहता है- 
उड़ो परिंदो उड़ो/
उड़ो जी भरकर।" 

विश्वग्राम की अवधारणा को रूपायित होने की प्रक्रिया में बाजारवाद के नाखून नोच रहे हैं और इस डर से कवि भी आशंकित है- 
"बदली हुई हवा के तेवर 
पता नहीं है कैसे होंगे।" 
किंतु मयंक श्री वास्तव जब अपने गीत -"हवा से कह दो" में उद्घोष करता है "अभी खिड़कियाँ खुली हुई हैं" तो अपने रचनाधर्म का पूरी तरह निर्वाह करते हुए आशावाद का अदम्य स्वरूप भी प्रस्तुत करता है। उसका आत्मविश्वास देखने लायक बनता है-
"इस दिये की रोशनीं को कम न आंको"। 

व्यवस्था और तंत्र की जकड़न में गीतकवि जीवन की बड़ी लड़ाई में जीत कर भी पराजित हो जाने को अभिशप्त है,
'मैं रोज डूबता उतराता
इस सागर की गहराई में 
मैं हुआ पराजित जीता भी 
जीवन की बड़ी लड़ाई में'

इसी क्रम में 'नासमझ बच्चे नहीं ' गीत में सशक्त व्यंजना द्वारा पूरे तंत्र पर प्रहार करते हुए कहा है, 
'अर्थभेदी शब्द अपने 
पास बारम्बार आएँ
किन्तु राजा 
कह रहा है 
हम सृजन के गीत गाएँ 
हलचलों के साथ में 
अपराधियों के काफिले 
संत साधू बेझिझक 
उन्मादियों से जा मिले 
हार थककर 
दूर होती 
जा रही संभावनाएँ '

संग्रह में अनेक गीत अपने पैनेपन और धारदार प्रहारों के कारण मयंक जी के सृजन को सार्थक रूप दे रहे हैं। 'शब्द चरित्र बदल लेते हैं ', 'उम्र मत माँगो',  'अमराइयाँ मत ढूँढ', 'हरिया गया हूँ मैं ',  'अनुवाद मत करना ' , 'छलना सीख लिया ' जैसे गीत कथ्य और शिल्प और भाषा में शब्द चयन के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 'छलना सीख लिया '  गीत की पंक्तियाँ देखिये ,
'तुम जमीन पर चलना अब तक 
सीख नहीं पाए 
अनसुलझे रह गए प्रश्न 
जो तुमने सुलझाए। 
...... कपटी मन से तुम 
शहदीली बातें करते हो 
कड़ुवेपन के साथ 
मधुरतम घातें करते हो 
........ स्वयं समझने अपने 
अंतर्मन में झाँको तुम
बुरी दृष्टि से नहीं
किसी के कद को आंको तुम
सूरत सही बताने वाले 
दर्पण चटकाए । 

कोई भी रचनाकार शून्य में रचना नहीं करता, न ही शून्य की उपज होता है। कवि मयंक श्री वास्तव का भी अपना एक रचनाकार संसार है।  उनके पास उम्र की भी लम्बी यात्रा है और लेखनी की भी जाहिर है दोनों कारक उसके साथसाथ उसकी रचनाशीलता में सहयोगी होते हैं। लम्बी यात्रा कर चुके किसी भी यात्री के पास, खासकर तब जब वह रचनाकार हो अपनी एक दृष्टि आ ही जाती है।  यही वह नेत्र होता है जो उसका अपना होता है। मयंक श्री वास्तव अपने इस नेत्र से बखूबी काम लेना जानते हैं। मयंक श्रीवास्तव जी का यह संग्रह अपनी समग्रता में एक पठनीय और गेय गीतों का उत्तम समुच्चय है जो अंत तक पाठक को सम्मोहित करता है। 
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गीत- नवगीत संग्रह - ठहरा हुआ समय, रचनाकार-  मयंक श्रीवास्तव, प्रकाशक-  पहले पहल प्रकाशन भोपाल। प्रथम संस्करण- २०१५, मूल्य- २५० रुपये, पृष्ठ-  , समीक्षा- जगदीश पंकज एवं वेदप्रकाश शर्मा वेद।